By | March 21, 2021
women's story in hindi

“हम सभी को श्रुति पसंद आई, हमें और कुछ भी नहीं चाहिए, दहेज तो हम ना लेते हैं ना ही देते हैं।” तभी श्रुति की आवाज आयी श्रुति ने कहा,“मुझे कुछ बोलना है। मुझे दहेज चाहिए।”

women’s story in hindi : आज श्रुति को देखने के लिए लड़के वाले आये, रिस्ता पड़ोस के ही एक रिश्ते में दादा लगते थे वही लेकर आये है, उन्हों ने पहले ही श्रुति के घर वालो से बता दिया है की, लड़का बहुत अच्छा पढ़ा लिखा है| उसके माँ बाप भी बहुत अच्छे हैं, नई सोच वाले। बिटिया को बहू नहीं बल्कि अपनी बिटिया बनकर रक्खेंगें

उसे मायके से ज्यादा ससुराल में प्यार मिलेगा। फिर भी अगर श्रुति को कुछ भी पूछना हो आराम से उसे पूछ लेने देना ”, श्रुति के पापा और मम्मी सिर हिलाते हुए हाँ कहा ।

तभी डोर बेल बजी, लड़के वाले आ गए। सबने उनका स्वागत किया, चाय नाश्ता का दौर चला। परिवार काफी सभ्‍य लग रहा था। लड़के की माँ ने श्रुति को दिखाने की बात कही। श्रुति अपनी भाभी के साथ आई। सभी को श्रुति बहुत पसंद आई। श्रुति को भी लड़का पसंद आया । दोनों परिवार के लोग खुश खुश थे।

तभी दादा जी ने कहा की आपकी कोई दहेज़ की डिमांड है तो बता दीजिये , “हमारे परिवार को तो ये रिश्ता मंजूर है, आप अपनी राय बता दीजिए और लेन-देन की भी। मेरा मतलब है आपकी कोई खास डिमांड हो तो?”

“हमें और हमारे परिवार को श्रुति पसंद आई, हम और कुछ नहीं चाहते, दहेज तो हम ना लेते हैं ना देते हैं।”

श्रुति के माँ-पापा ने राहत की सांस ली।

तभी श्रुति ने कहा, “मुझे कुछ बोलना है। मुझे दहेज चाहिए।”

खुशी के माहोल में शान्ति छा गई।

श्रुति की माँ ने कहा , “बेटा ये क्या मजाक है? बेटियाँ दहेज थोड़ी ही लेती हैं?”

“माँ मजाक नहीं ये सच है। यही मेरी जिंदगी की हकीकत है। जब से होश संभाला है, यही तो सुना है की श्रुति पर इतना खर्च मत करो उसे तो दहेज देना है बेटी तो पराया धन होती है । बचपन में भाई को होली दिवाली या जन्मदिन कुछ भी हो नए कपड़े तोहफे दिए जाते थे।”

“हर साल भाई का जन्मदिन मनाया जाता था, पर मुझे सिर्फ़ दीवाली पर नए कपड़े मिलते थे। जन्मदिन तो कभी मनाया ही नहीं। सिर्फ इसलिए कि मेरे लिए दहेज जोड़ना था! मेरा पूरा बचपन इसलिए सूना कर दिया आप मां-पापा ने।”

“आपको याद है ? मैं कितना रोई थी कि मेरी पढ़ाई मत बंद कराओ, पर किसी ने नहीं सुना। भाई तो पढ़ने में अच्छा भी नहीं था। भाई का मन भी नहीं था तो भी उसे अच्छे कॉलेज में दाखिला दिला दिया और उसने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। तब भी यही कहा था कि पढ़ा के क्या करना है श्रुति को? वो तो दूसरे घर जाएगी। कम से कम कुछ रुपये तो बचेंगे दहेज के।”

“फ़िर मैंने घर में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने की कितनी मिन्नते की पर मेरी किसी ने नहीं सुनी, तब सब ने कहा की भाई को बिज़नस कराना है। इसलिए दस लाख रुपये भाई के बिज़नस में लगा दिए और वो काम भी नहीं चला।

इसके बावजूद भाई को और पैसे देने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं बिना दहेज के शादी हो जाए? वो दहेज जिस पर मेरा हक है, मेरे बचपन के खिलौने हैं, मेरी पढ़ाई है मेरी अधूरी इच्छा है। पूरी जिंदगी ये बोलकर मुझे कोई हक़ नहीं दिया कि मुझे दहेज देना है तो फिर आज अगर मैं अपना हक़ मांग रही हूँ तो क्या गलत कर रही हूँ?”

 

कृपया इस कहानी में। अपनी राय जरूर बताये

नोट :ये कहानी मात्र एक काल्पनिक है, किसी भी प्रकार से दहेज प्रथा का समर्थन नहीं करती है। और ये कहानी किसी की वास्तविक ज़िंदगी से रिलेट करती है तो महज एक इत्तेफ़ाक़ भर ही है

 

 

Leave a Reply